मध्य प्रदेश के भिण्ड जिले के मालनपुर थाने में पदस्थ टी आई रमाकांत वाजपेयी द्वारा जहर खाकर की गई आत्महत्या ने पूरे पुलिस विभाग में खलबली मचा दी है। खलबली की वजह टी आई की आत्महत्या नहीं बल्कि उनके द्वारा लिखा गया सुसाइड नोट है जिसमें उन्होंने अपनी आत्महत्या के लिये एक महिला प्रधान आरक्षक उसके भाई, माता-पिता तथा कुछ आईपीएस अधिकारियों को दोषी ठहराया है।आईपीएस अधिकारियों का नाम प्रकरण में उछलते ही कई राजनीतिक पार्टियों के साथ वाजपेयी जी के परिवार वालों ने मामले की सीबीआई जांच की मांग शुरू कर दी है परंतु पुलिस विभाग के आला अधिकारियों ने इसकी जांच सीआईडी को सौंप कर तुरंत जांच के आदेश दिये लेकिन सुसाइड नोट में नामजद आईपीएस अधिकारियों को आरोपी नहीं बनाया गया। कहा जा रहा है कि आरोपी वाले कॉलम को खाली छोड़ दिया गया है जैसे जैसे जांच आगे बढ़ती जायेगी, जिसके खिलाफ भी सबूत मिलते जायेंगे उन्हें आरोपी बनाया जायेगा।
क्यों ?
इसलिये कि कानून कहता है कि पहले जांच की जाये यदि किसी के खिलाफ सबूत मिलें तो ही उसे आरोपी बनाया जाये ?
या सिर्फ इसलिये कि सुसाइड नोट में जिनके नाम आत्महत्या के लिये प्रेरित करने वालों में हैं वे आईपीएस अधिकारी हैं ?
यदि पहली बात सही है तो ऐसा उन हजारों लाखों प्रकरणों में क्यों नहीं किया जाता जो थानों में रोज दर्ज होते हैं। उन प्रकरणों में तो किसी की मामूली सी शिकायत पर या सिर्फ शक के आधार पर किसी को भी आरोपी पहले बनाया जाता है फिर उसे तोड़ा जाता है फिर जांच के नाम पर औपचारिकता की जाती है और प्रकरण कोर्ट में पेश कर उसे कई सालों की यातना दे दी जाती है।
और यदि दूसरी बात सही है तो फिर हमें बचपन से ये क्यों सिखाया जाता है कि कानून सबके लिये समान है।
यदि किसी और आत्महत्या के प्रकरण में कोई सुसाईड नोट मिलता और उसमें मृतक ने आत्महत्या के लिये प्रेरित करने वाले लोगों के नामों का उल्लेख किया होता और वो नाम किसी आईएएस, किसी आईपीएस या किसी और बड़ी हस्ती के नहीं होते तो भी क्या पहले जांच की औपचारिकता होती। शायद नहीं शायद क्या होती ही नहीं। उनको पहले पकड़कर सलाखों के पीछे किया जाता, फिर उनके खिलाफ प्रकरण दर्ज होता और फिर जांच की कार्यवाही आगे बढ़ती।

1 टिप्पणियाँ:
Nice Post !
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